By – राजेश खण्डेलवाल
29 December 2025
अखबार की कतरनों ने राजस्थान के झालावाड़ जिले में साधारण परिवार की Sushila की किस्मत बदल डाली, जो लोग पहले Sushila को ताने मारते थे, वही आज उसकी तारीफ करते नहीं थकते। सुशीला ने 50 अन्य महिलाओं को रोजगार देकर आत्मनिर्भर भी बनाया है। Sushila का यह इनोवेशन अब अमेरिका तक पहुंच चुका है।
झालावाड़ की Sushila के इनोवशन की धाक अमेरिका तक
झालावाड़ (राजस्थान)। रोज सुबह घरों में फेंका जाने वाला अखबार, जिसे लोग रद्दी समझकर वजन के भाव बेच देते हैं, उसी अखबार ने झालावाड़ की एक साधारण ग्रामीण महिला Sushila की किस्मत बदल दी। झालावाड़ जिले के असनावर की रहने वाली Sushila Devi ने न्यूजपेपर (अखबार) की कतरनों को हथकरघे पर बुनकर ऐसा इनोवेशन किया कि उनके बनाए लैपटॉप बैग, टोट बैग और शगुन लिफाफे अब अमेरिका तक सप्लाई हो रहे हैं। यही नहीं, Sushila के इस प्रयोग ने 50 ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देकर आत्मनिर्भर बना दिया है।
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- Sushila दे रही अखबार की कतरनों से 50 महिलाओं को रोजगार
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….पर नहीं टूटा हौसला
17 साल पहले पति के स्वर्गवास के बाद Sushila Devi के कंधों पर चार बेटियां और एक बेटा की जिम्मेदारी थी। आर्थिक तंगी, समाज के ताने और अकेलेपन की चिंता सताती थी। Sushila ने पॉजिटिव कनेक्ट को बताया कि वह सोचती थी अब कैसे बच्चों को पढ़ाऊं, घर कैसे चलाऊं पर हिम्मत नहीं हारी। इसी संघर्ष के बीच हैंडलूम, सिलाई और ब्लॉक प्रिंटिंग की ट्रेनिंग का पता चला तो इन्हें सीखने और आगे बढऩे का फैसला किया।
कतरनों से कामयाबी तक
पॉजिटिव कनेक्ट से बातचीत में Sushila बताती हैं कि काम शुरू हुआ साधारण धागे और कपड़े से, लेकिन असली परिवर्तन तब आया जब एक दिन Sushila के दिमाग में सवाल उठा, क्यों न फेंके हुए अखबार को कपड़े की तरह बुनकर कुछ नया बनाया जाए? बस, यहीं से किस्मत ने पलटा खाया।
अखबार की काटते हैं पतली-पतली कतरनें
Sushila बताती हैं कि अखबार की पतली-पतली कतरनें काटकर उन्हें धागे के साथ हैंडलूम में इस्तेमाल किया। फिर उसी से लैपटॉप बैग, टोट बैग, ज्वेलरी बैग, शगुन लिफाफे, गिफ्ट पैक आदि बनाने लगे। इसके बाद पेपर को हल्दी, इंडिगो जैसी नेचुरल डाई में रंगकर और भी खूबसूरत व टिकाऊ प्रोडक्ट बनाने शुरू किए।
Sushila बताती हैं कि अमेरिका में इसका बहुत क्रेज है। सालभर वहां से ऑर्डर आते रहते हैं। महीने में 5-6 लाख तक का सामान भेज देते हैं।
बचत, लोन, हिम्मत…
चर्चा के दौरान Sushila ने पॉजिटिव कनेक्ट को बताया कि रोजगार शुरू करना आसान नहीं था। पैसा नहीं था, संसाधन नहीं थे और समाज का दबाव अलग, लेकिन Sushila और आसपास की महिलाओं ने छोटी-छोटी बचत जमा की। चार हिस्सा हमने बचाया, चार हिस्सा बैंक ने दिया। बस उसी से यूनिट खड़ी कर दी। धीरे-धीरे महिलाएं जुड़ती गईं, सीखती गईं, कमाती गईं। आज एक ही छत के नीचे 50 महिलाएं हैं, जो कटिंग, बुनाई, सिलाई, डाईंग और ब्लॉक प्रिंटिंग का काम करती हैं।
दिल्ली से लाते हैं धागा
पिछले दिनों भरतपुर की अमृता हाट में झालरापाटन स्वयं सहायता समूह के नाम से स्टॉल लगाने वाली Sushila Devi ने बताया कि दिल्ली से धागा लाकर हैंडलूम पर बेडशीट, टॉवल, खेस, क्विल्टेड बेडशीट और जैकेट तैयार किए जाते हैं। फिर उसी पर होती है हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग, बिना किसी मशीन के पूरी तरह हाथों से। उनके प्रोडक्ट की कीमतें 50 से 2500 रुपए तक हैं। हाट ने उन्होंने रोज 10-20 हजार तक की सेल की।
तानों को बनाया ताकत तब मिली तारीफ
शुरुआत में Sushila को समाज के तिरछे सवालों का सामना करना पड़ा। अकेली महिला बाहर क्यों जाती है? क्या जरूरत है ये सब करने की। Sushila ने बताया कि उन्होंने इन तानों को अपनी ताकत बनाया।
आज वही ताने मारने वाले लोग Sushila Devi के हुनर और हिम्मत की सराहना करते हैं। अगर रुक जाती तो शायद कुछ नहीं बदलता। आगे बढ़ी तो 50 महिलाओं का जीवन भी बदल गया। वे 30 से ज्यादा प्रोडक्ट बनाती हैं। उन्हें कई जगह सम्मानित भी किया जा चुका है।
