By – राजेश खण्डेलवाल
30 September 2025
Rajesh Lawania राजस्थान के अलवर जिले में 500 सरकारी स्कूलों में बदलाव के नायक हैं। इस तरह उन्होंने सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों से बेहतर बनाया है। यह बदलाव सरकारी स्कूलों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिसाल पेश कर रहा है। जर्जर भवनों से लेकर थीम बेस्ड क्लासरूम, वाटर हार्वेस्टिंग, डिजिटल लाइब्रेरी और अलवर ई-विद्या जैसे प्रोजेक्ट ने शिक्षा को नई दिशा दी।
Rajesh Lawania ने सरकारी स्कूलों की छवि को दिया नया जीवन
अलवर (राजस्थान)। राजस्थान के अलवर जिले में सरकारी स्कूलों में बदलाव की नई कहानी शिक्षा के क्षेत्र में अद्भुत उदाहरण है, जो शिक्षा नायक Rajesh Lawania के शिक्षा के प्रति समर्पण की मिसाल है।
तीन से चार दशक पहले तक ये स्कूल अपनी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और हजारों छात्रों की संख्या के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे। इनमें प्रवेश पाना चुनौती हुआ करती थी और ये संस्थान शिक्षा का प्रतीक माने जाते थे, लेकिन समय के साथ ये स्कूल अपनी चमक खो बैठे।
जर्जर भवन, फटी दरी पट्टियों पर बैठते बच्चे, खराब शौचालय और पेयजल की कमी ने इनकी पहचान को धूमिल कर दिया। अभिभावकों ने निजी स्कूलों की ओर रुख किया, जिससे सरकारी स्कूलों में वीरानी सी छा गई। निजी स्कूलों की बढ़ती फीस ने निम्न आय वर्ग, खासकर मजदूर वर्ग के बच्चों को शिक्षा से वंचित कर दिया।
अलवर में Rajesh Lawania ने सरकारी स्कूलों के कायाकल्प के साथ क्रांतिकारी बदलाव की शुरूआत वर्ष 2008 में की, जिन्होंने न केवल अलवर बल्कि पूरे देश में सरकारी स्कूलों की छवि को नया जीवन दिया। यह यात्रा सामूहिक प्रयास, नवाचार और समुदाय की भागीदारी का जीवंत प्रमाण है।
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अलवर के सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत
शिक्षा नायक Rajesh Lawania पॉजिटिव कनेक्ट को बताते हैं कि अलवर में सरकारी स्कूलों के कायाकल्प से पहले धीरे-धीरे रखरखाव की कमी, संसाधनों का अभाव और प्रशासनिक उदासीनता ने इनकी स्थिति को दयनीय बना दिया। स्कूल भवनों की दीवारें जर्जर हो गईं।
वर्षों से पुताई नहीं हुई और जमीन पर फटी दरी ही बच्चों के बैठने का सहारा थी। शौचालय नाममात्र के थे, जहां सफाई का अभाव था। पेयजल के लिए एक खराब हैंडपंप ही उपलब्ध होता था। नतीजन, अभिभावकों का भरोसा सरकारी स्कूलों से उठ गया।
निजी स्कूलों की ओर पलायन
पॉजिटिव कनेक्ट को Rajesh Lawania बताते हैं कि जब तक अलवर में सरकारी स्कूलों का कायाकल्प नहीं हुआ था, तब तक सरकारी स्कूलों की बदहाली के कारण अभिभावक अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने लगे, जहां बेहतर सुविधाएं और शिक्षा की गुणवत्ता का वादा था। इस बदलाव का सबसे बड़ा नुकसान निम्न आय वर्ग के बच्चों को हुआ।
निम्न आय वर्ग पर असर
Rajesh Lawania बताते हैं कि मजदूर परिवारों के लिए निजी स्कूलों की फीस वहन करना असंभव था, जिससे कई बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित हो गए। ड्रॉपआउट रेट बढ़ा और शिक्षा का अधिकार मात्र एक सपना बनकर रह गया। अलवर जैसे ग्रामीण-शहरी मिश्रित जिले में यह समस्या और गंभीर थी, जहां अधिकांश आबादी कृषि और मजदूरी पर निर्भर है। इस समस्या को अलवर में सरकारी स्कूलों के बदलाव ने काफी हद तक थामा है।
2008 में शुरू हुई शिक्षा क्रांति
वर्ष 2008 में अलवर के सरकारी स्कूलों में बदलाव की एक नई लहर शुरू हुई। इस शिक्षा क्रांति की शुरुआत अलवर शहर के ही मोरसराय के एक छोटे से स्कूल से हुई, जहां शिक्षक से सर्व शिक्षा अभियान (SSA) के इंजीनियर बने Rajesh Lawania ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग का उपयोग किया।
मोरसराय स्कूल का सफल मॉडल
एसएसए के अभियंता Rajesh Lawania पॉजिटिव कनेक्ट को बताते हैं कि मोरसराय का राजकीय उच्च प्राथमिक स्कूल भवनविहीन होने के कारण एक मंदिर में चलता था। इस सरकारी स्कूल में कायाकल्प से पहले आठ कक्षाओं में छात्रों की कुल संख्या मात्र 35 थी।
पॉजिटिव कनेक्ट से चर्चा के दौरान Rajesh Lawania बताते हैं कि मैंने आसपास के लोगों से इस संबंध में चर्चा की और कुछ राशि भी उनसे एकत्र की। यूआईटी से भूमि आवंटित कराकर दो मंजिला भवन बनवाया।
इस भव्य भवन के बनने के बाद छात्रों की संख्या 10 गुणा बढकऱ 350 हो गई। अलवर के सरकारी स्कूल में बदलाव की इस सफलता ने अन्य स्कूलों के लिए एक मॉडल प्रस्तुत किया और इस पर विभाग ने मुझे राज्य स्तरीय अवार्ड प्रदान किया।
सामुदायिक सहयोग
सर्व शिक्षा अभियान के बजट के साथ-साथ समुदाय, गैर-सरकारी संगठनों और दानदाताओं का सहयोग मिला तो धीरे-धीरे अलवर के सरकारी स्कूलों में बदलाव होने से उनका परिदृश्य ही बदलने लगा।
थीम बेस्ड क्लासरूम और बीएएलए मॉडल
अलवर में सरकारी स्कूलों के बदलाव में नवाचारों की भूमिका प्रमुख रही। अलवर के सरकारी स्कूलों ने अपनी खोई हुई पहचान को पुनर्जीवित करने के लिए अनोखे तरीके अपनाए।
रेलवे स्टेशन और हवाई जहाज जैसे थीम स्कूल
पॉजिटिव कनेक्ट को उदाहरण देते हुए Rajesh Lawania बताते हैं कि रेलवे स्टेशन स्कूल को ट्रेन की तरह रंगने का विचार न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना।
इसके बाद हवाई जहाज और क्रूज जैसे थीम वाले सरकारी स्कूल भवनों ने अलवर की ब्रांडिंग को मजबूत किया। ये थीम्स बच्चों को आकर्षित करने लगी तो इसने शिक्षा को मनोरंजक भी बनाया। ये बच्चों के साथ ग्रामीणों के लिए भी सेल्फी प्वाइंट बने हैं।
बिल्डिंग एज लर्निंग ऐड (BALA) का उपयोग
अलवर के सरकारी स्कूलों में बदलाव के दौरान बिल्डिंग एज लर्निंग ऐड (BALA) की अवधारणा ने भवनों और परिसर को शिक्षण का हिस्सा बना दिया।
दीवारों पर चित्रित गणितीय सूत्र, विज्ञान के मॉडल और भाषा के खेल ने बच्चों की सीखने की क्षमता में वृद्धि की, जिसे पूरे देश में सराहा गया, जो दर्शाता है कि साधारण बदलाव कैसे गहन प्रभाव डाल सकते हैं।
500 से ज्यादा स्कूलों में वाटर हार्वेस्टिंग
चर्चा के दौरान Rajesh Lawania बताते हैं कि अलवर के सरकारी स्कूलों के कायाकल्प में एक और महत्वपूर्ण कदम वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की स्थापना था।
अलवर का अधिकांश हिस्सा ड्राई जोन में है, जहां पानी की कमी एक बड़ी समस्या है। लेकिन 500 से अधिक स्कूलों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित किए गए, जिससे करोड़ों लीटर बारिश का पानी संरक्षित हो रहा है।
जल संरक्षण और स्वच्छ वातावरण
Rajesh Lawania बताते हैं, इस पानी का उपयोग बागवानी, शौचालयों की सफाई और अन्य जरूरतों के लिए किया जाता है। परिणामस्वरूप, अलवर के सरकारी स्कूलों के कायाकल्प से पर्यावरण स्वच्छ और हरा-भरा हो गया।
बच्चों में पर्यावरण जागरूकता
बच्चे अब पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा भी ग्रहण कर रहे हैं, जो उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाता है। सरकारी स्कूलों में बदलाव की यह पहल न केवल जल संरक्षण में योगदान दे रही है बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एक स्थानीय स्तर का मॉडल भी प्रस्तुत कर रही है।
डिजिटल युग की ओर कदम-अलवर ई-विद्या
Rajesh Lawania बताते हैं, आज के डिजिटल युग में अलवर ने शिक्षा को आधुनिक बनाने के लिए कदम उठाए हैं। अलवर की कलक्टर डॉ. अर्तिका शुक्ला ने ‘अलवर ई-विद्या’ प्रोजेक्ट की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य ग्रामीण और शहरी बच्चों के बीच डिजिटल शिक्षा की खाई को पाटना है, जो अलवर में सरकारी स्कूलों के कायाकल्प में मील का पत्थर साबित होगा।
डिजिटल लाइब्रेरी की स्थापना
अलवर ई-विद्या प्रोजेक्ट के तहत प्रत्येक ग्राम पंचायत में कम से कम एक स्कूल में डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित की जा रही है। इन लाइब्रेरी में 8 से 10 कंप्यूटर, इनवर्टर और इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध होगी। इसके अलावा, स्वच्छ शौचालय, बीएएलए वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम और ग्रीन कैंपस पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
ई-गुरुकुल की पहल
Rajesh Lawania ने बताया कि अलवर के सरकारी स्कूलों के कायाकल्प की दिशा में सार्थक कदम बढ़ाते हुए अलवर के सांसद और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने अपनी निधि से सैकड़ों स्कूलों में लाइब्रेरी कक्ष स्वीकृत किए, जिन्हें ‘ई-गुरुकुल’ का नाम दिया गया। ये कक्ष आधुनिक पुस्तकों, ई-बुक्स और डिजिटल टूल्स से सुसज्जित होंगे।
ई-मैंगजीन और ब्लागिंग
प्रोजेक्ट अलवर ई-विद्या के तहत स्कूल अब अपनी ई-मैगज़ीन प्रकाशित कर रहे हैं, और शिक्षक व बच्चे ब्लॉग लिखने में सक्रिय हो रहे हैं। जिले के प्रधानाचार्यों और कंप्यूटर अनुदेशकों को उनकी क्षमता वर्धन के लिए प्रशिक्षण प्रदान किया गया है।
Rajesh Lawania बताते हैं, ये प्रयास न केवल शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ा रहे हैं, बल्कि बच्चों को डिजिटल दुनिया से जोड़ रहे हैं। अलवर के सरकारी स्कूलों के कायाकल्प में यह कदम भविष्य में युवाओं की नौकरियों के लिए आवश्यक है।
समुदाय और दानदाताओं की अहम भूमिका
अलवर के सरकारी स्कूलों के कायाकल्प में सरकार के साथ समुदाय और दानदाताओं की भूमिका अहम रही है।
सहगल फाउण्डेशन और थीम क्लासरूम
Rajesh Lawania बताते हैं, गैर-सरकारी संगठन जैसे सहगल फाउंडेशन ने स्कूलों को ट्रेन, हवाई जहाज और पानी के जहाज जैसे थीम वाले कक्ष प्रदान किए। बसनुमा शौचालयों ने बच्चों के लिए सुविधाओं को आकर्षक बनाया। इन प्रयासों ने स्कूलों की ब्रांडिंग बढ़ाई और नामांकन तथा ठहराव (रिटेंशन) में वृद्धि की।
सीएसआर कंपनियों का योगदान
Rajesh Lawania ने बताया कि अलवर के सरकारी स्कूलों के कायाकल्प में मेटसो, डाबर, अशोका लीलैंड, रोका पेरिवेयर, अंबुजा फाउंडेशन, इब्तिदा, पीएचडी फाउंडेशन, आरडीएनसी मित्तल फाउंडेशन और लुपिन जैसी सीएसआर कंपनियों ने विभिन्न तरीकों से सहयोग प्रदान किया। ये सहयोगी शिक्षा को एक सामाजिक आंदोलन बना रहे हैं, जहां हर कोई योगदान दे सकता है।
भविष्य की दिशा
भविष्य में, डिजिटल शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और समावेशी शिक्षा के क्षेत्र में और प्रगति करने के लिए तैयार हैं।
शिक्षा का नया मॉडल
सरकारी स्कूलों में बदलाव के नायक Rajesh Lawania बताते हैं कि
‘अलवर ई-विद्या’ जैसे प्रोजेक्ट्स और ई-गुरुकुल जैसी पहलें अलवर के सरकारी स्कूलों के कायाकल्प की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। ये स्कूल अब न केवल शिक्षा प्रदान करते हैं, बल्कि बच्चों के सपनों को उड़ान देने का मंच बन चुके हैं।
अलवर की यह यात्रा एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि सामूहिक प्रयास से शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है। जर्जर भवनों से शुरू होकर, ये स्कूल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिसाल कायम कर रहे हैं।
ग्रीन कैंपस
सर्व शिक्षा अभियान (SSA) के इंजीनियर Rajesh Lawania ने सकारात्मक पहल करते हुए अलवर के सरकारी स्कूलों को चाइल्ड-फ्रेंडली, इको-फ्रेंडली और आकर्षक बनाया। बुनियादी सुविधाएं जैसे साफ-सुथरे शौचालय, पेयजल व्यवस्था, रंग-बिरंगे क्लासरूम और हरा-भरा परिसर उपलब्ध कराया। इस पहल का परिणाम अभूतपूर्व रहा और नामांकन में जबरदस्त वृद्धि हुई।
शिक्षा का हीरो: राजेश लवानियां
मूलत: भरतपुर जिले के नदबई कस्बा निवासी Rajesh Lawania पॉजिटिव कनेक्ट को बताते हैं कि वर्ष 1992 में शिक्षक के रूप में मेरी पहली पोस्टिंग अलवर जिले के रामगढ़ ब्लॉक के धनेटा गांव के राजकीय माध्यमिक स्कूल में हुई।
अलवर शहर के कई सरकारी स्कूलों में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दी। चूंकि नौकरी लगने से पहले वर्ष 1988 में ही वे सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कर चुके थे। इस कारण वर्ष 2008 में प्रतिनियुक्ति पर सर्व शिक्षा अभियान में कनिष्ठ अभियंता के रूप में काम करने की जिम्मेदारी मिली।
यह जिम्मेदारी मिलने के बाद मैंने (Rajesh Lawania) अपने सपने को साकार करना शुरू किया। अभी तक राज्यस्तर के 7 अवार्ड मिल चुके हैं। सबसे बड़ा योग्यता पुरस्कार मुझे वर्ष 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्यस्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह में प्रदान किया। इससे मेरा हौंसला बढ़ाकर और फिर कभी पीछे मुडकऱ नहीं देखा।
अपनी उपलब्धि पर हर्ष जताते हुए Rajesh Lawania पॉजिटिव कनेक्ट को बताते हैं कि 500 से ज्यादा सरकारी स्कूलों में बदलाव के सपने को सहभागी बनकर साकार करके गर्व की अनुभूति होती है।
हर शिक्षा प्रेमी के लिए प्रेरणादायक कहानी
शिक्षा नायक Rajesh Lawania बताते हैं कि अलवर के सरकारी स्कूलों में बदलाव की यह कहानी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणादायक है, जो शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देना चाहता है।
अलवर ने साबित किया है कि सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों से बेहतर बनाया जा सकता है, बशर्ते लोगों में इच्छाशक्ति और सहयोग की भावना का समावेश हो।
