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एक पहल

Jagram Gurjar 3 दशक के संघर्ष से संगठन बनाने तक की कहानी

Jagram Gurjar
jagram gurjar bayana, Bharatpur Rajasthan

By – Positive Connect
12 February 2026

जगराम गुर्जर (Jagram Gurjar) ने पारंपरिक मेलों के आयोजन का जब काम शुरू किया, तब उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि यह रास्ता उनकी पहचान बन जाएगा। मेले उनके लिए केवल व्यापार नहीं थे, बल्कि इस दौरान Jagram Gurjar ने जीवन को देखा और समझा भी। 3 दशक से इस संघर्षमय सफर के दौरान उनके मन में विचार आया कि अगर हम संगठित हों तो हमारी बात सुनी जाएगी। इसी विचार ने उस संगठन की आधारशिला रखने का काम किया, जिसके बारे में संगठित मेले वाले सोच भी नहीं सकते थे।

Jagram Gurjar

Jagram Gurjar ने पसीने से चुकाई सपनों की कीमत

भरतपुर (राजस्थान) । भरतपुर जिले के बयाना क्षेत्र के गांव शाहपुर डांग में जन्मे 56 वर्षीय जगराम गुर्जर (Jagram Gurjar) उन लोगों में हैं, जो परिस्थितियों के आगे झुकते नहीं हैं, बल्कि उन्हें अपनी दिशा बदलने पर मजबूर कर देते हैं। उनका जीवन गवाह है कि संघर्ष यदि संकल्प से जुड़ जाए तो वह केवल व्यक्ति का ही नहीं, पूरे समाज का भविष्य भी बदल सकता है।

Jagram Gurjar का बचपन अभावों के बीच बीता। जीवन के अनुभवों ने उन्हें बहुत जल्दी सिखा दिया था कि सपनों की कीमत पसीने से चुकानी पड़ती है। उन्होंने मेहनत-मजदूरी की, छोटे-मोटे सामान बेचे और हर वह काम किया, जिससे परिवार का चूल्हा जल सके। यह दौर कठिन था, लेकिन इसी कठिनाई ने उनके भीतर अदम्य धैर्य और आत्म विश्वास पैदा किया।

मेलों में केवल कारोबार नहीं, जीवन देखा…

करीब 30 वर्ष पहले जब Jagram Gurjar ने पारंपरिक मेलों के आयोजन का काम शुरू किया। तब शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि यह रास्ता उनकी पहचान बन जाएगा। मेले उनके लिए केवल व्यापार नहीं थे। उन्हें ये मेले देश की जीवंत लोक संस्कृति, छोटे व्यापारियों की उम्मीदों और ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की धडकऩ जैसे लगते थे। लेकिन इस दुनिया के भीतर एक सन्नाटा भी था।

जगराम के मन में ऐसे आया विचार

मेला आयोजक बिखरे हुए थे। समस्याएं सबकी एक जैसी थीं पर आवाज किसी के पास नहीं थी। प्रशासनिक दबाव, बढ़ती लागत और मनमानी शर्तें आयोजकों को कमजोर कर रही थीं। तभी Jagram Gurjar के मन में एक विचार आया कि अगर हम संगठित हों तो हमारी बात सुनी जाएगी। इसी विचार ने उस संगठन की आधारशिला रखने का काम किया, जिसके बारे में संगठित मेले वाले सोच भी नहीं सकते थे।

Jagram Gurjar
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असफलता से नहीं टूटा विश्वास…

करीब 10-12 वर्ष पहले Jagram Gurjar ने मेला आयोजकों को एकजुट करने की कोशिश की। वे लोगों से मिले, समझाया, प्रेरित किया पर समय साथ नहीं था। प्रयास विफल रहा। जब प्रयास विफल होता है तो अक्सर लोग यहीं रुक जाते हैं, लेकिन Jagram Gurjar नहीं रुके। उन्होंने इंतजार किया सही समय का। पिछले वर्ष Jagram Gurjar ने फिर पहल की। इस बार उनकी बातों में अनुभव का सार था और इरादों में भरोसे की ताकत। इसी के बूते पहला परिणाम सामने आया, जिसके चलते राजस्थान मेला आयोजक संघ का विधिवत गठन हुआ।

सिर्फ संगठन नहीं, अनसुनी आवाजों का मंच

यह सिर्फ एक संगठन नहीं था बल्कि यह वर्षों से अनसुनी की जा रही आवाजों का मंच था। इस संघ ने जल्द ही असर दिखाया। घाटे में डूबते मेला कारोबार को संभालने की दिशा में कदम उठे। अनुचित शर्तें थोपने वाले अधिकारियों के खिलाफ आवाज बुलंद हुई। प्रयास इतने प्रभावी रहे कि कई स्थानीय निकायों को अपनी मनमानी वापस लेनी पड़ी। यह वह क्षण था जब मेला आयोजकों ने महसूस किया कि संगठन केवल ढांचा नहीं, शक्ति होता है।

सोच ले गई राजस्थान से राष्ट्र तक…

राजस्थान में मिली सफलता ने Jagram Gurjar की दृष्टि को सीमित नहीं किया, उसने उसे और व्यापक बना दिया। Jagram Gurjar ने सोचा कि जब एक राज्य माहौल में कुछ बदलाव ला सकता है तो पूरा देश क्यों नहीं? Jagram Gurjar ने विभिन्न राज्यों के आयोजकों से संवाद शुरू किया, उनकी आशंकाएं दूर कीं और उन्हें एक साझा मंच की आवश्यकता समझाई।

Jagram Gurjar

ग्रुरुग्राम में हुई संघ की बैठक

हाल ही में गुरुग्राम में आयोजित बैठक में देश के विभिन्न राज्यों के मेला आयोजक जुटे और ‘भारतीय मेला एसोसिएशन’ का गठन हुआ। इसमें सतपाल सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष और जगराम गुर्जर को राष्ट्रीय महासचिव चुना गया। कार्यकारिणी में देश भर से अन्य पदाधिकारी भी बनाए गए। यकीनन, यह उपलब्धि बड़ी थी लेकिन Jagram Gurjar की विनम्रता उससे भी बड़ी है। पॉजिटिव कनेक्ट से बातचीत मे Jagram Gurjar ने संगठन का श्रेय लेने से विनम्रता से इनकार कर दिया। गुर्जर कहते हैं कि यह किसी एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि सैकड़ों मेला आयोजकों की उम्मीदों का परिणाम है।

श्रेय से दूर, जिम्मेदारी के करीब…

नेतृत्व अक्सर पहचान मांगता है पर Jagram Gurjar पहचान से ज्यादा जिम्मेदारी को महत्व देते हैं। उनका विश्वास अटल है कि संगठन में ही शक्ति होती है। नवगठित भारतीय मेला एसोसिएशन ने संकल्प लिया है कि किसी भी राज्य का मेला आयोजक अकेला नहीं रहेगा। समस्याओं के समाधान से लेकर कारोबार में नवाचार तक, हर स्तर पर सामूहिक प्रयास किए जाएंगे ताकि पारंपरिक मेले समय के साथ और मजबूत बन सकें।

एक व्यक्ति से बढकऱ है एक विचार…

Jagram Gurjar की कहानी दरअसल एक विचार की कहानी है। यह वह विचार है जो ‘मैं’ से ‘हम’ तक की यात्रा तय करता है। मेहनत-मजदूरी से शुरू हुआ उनका सफर आज राष्ट्रीय स्तर के संगठन तक पहुंच चुका है पर उनकी सादगी आज भी वैसी ही है। और यही सादगी उन्हें भरोसेमंद बनाती है और यही कारण है कि लोग उनके (Jagram Gurjar) साथ खड़े दिखाई देते हैं।

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