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एक पहल

Illiteracy in Mewat : 2 दशक से दाग मिटा रही मुस्लिम बेटियां

Illiteracy in Mewat

Illiteracy in Mewat पिछले 2 दशक से राजस्थान में अलवर जिले की मुस्लिम बेटियां पढ़-लिखकर समाज में उजियारा फैला रही है और शिक्षा के जरिए अशिक्षा रूपी दाग को मिटा रही हैं पर राजस्थान के मेवात में ज्यादातर परिवारों में आज भी पुराने ख्यालातों के कारण अशिक्षा रूपी अंधियारा छाया है।

Illiteracy in Mewat

Illiteracy in Mewat रुढि़वादी सोच का नतीजा

अलवर/भरतपुर। राजस्थान के मेवात में अशिक्षा  (Illiteracy in Mewat) का दाग मुस्लिम समुदाय में रुढि़वादी सोच का नतीजा है। हालांकि पिछले 2 दशक में पढ़-लिखकर अच्छे पदों पर कार्यरत मुस्लिम बेटियां Illiteracy in Mewat रूपी दाग को मिटाने में लगी हैं। दूरदराज के गांवों में आज भी रुढि़वादी सोच हावी है, जो बालिका शिक्षा की राह में सबसे बड़ी बाधक बनी है।

पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो चुकी मुस्लिम समुदाय की अनेक बेटियां शिक्षा का उजियारा तो फैला ही रही हैं, अन्य बालिकाओं को प्रेरित करने के साथ ही व्याप्त रुढि़वादी सोच को बदलने और Illiteracy in Mewat रूपी दाग को मिटाने का जतन भी कर रही हैं।

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अफसाना : कॉलेज में उर्दू की सहायक आचार्य

अलवर में लक्ष्मणगढ़ ब्लॉक के मौजपुर गांव की बेटी अफसाना मेवात में संभवत: ऐसी पहली महिला हैं, जिन्होंने उर्दू भाषा पहले एमए किया और फिर उर्दू में ही पीएचडी भी की। आज वे रामगढ़ के सरकारी कॉलेज में उर्दू की सहायक आचार्य के रूप में कार्यरत हैं, जो Illiteracy in Mewat के दाग को मिटाने की मिसाल बनी हैं।

मदरसे में नहीं लगा मन, स्कूल से जुड़ी

घांसोली (किशनगढ़बास) में ब्याही अफसाना पॉजिटिव कनेक्ट को बताती हैं कि उनके परिवार में वह सबसे बड़ी बेटी हैं। शुरूआत में ग्रहणी मां फइमन का रुझान उर्दू पढ़ाने की ओर था तो मदरसे से प्रारंभिक शिक्षा लेने पहुंची, लेकिन वहां मेरा मन नहीं लगा तो मौजपुर में सरकारी शिक्षक के रूप में कार्यरत व मेरे चाचा असरुद्दीन ने स्कूली शिक्षा से जोड़ा।

12वीं के बाद महारानी कॉलेज जयपुर से ग्रेजुएशन किया और राजस्थान यूनिवर्सिटी जयपुर से अपनी मास्टर्स और पीएचडी की। उसके बाद कड़ी मेहनत से सहायक आचार्य के पद पर कामयाबी हासिल की।

कामयाबी में परिवार का बड़ा सहयोग

पॉजिटिव कनेक्ट से चर्चा के दौरान Illiteracy in Mewat के दाग को मिटाने की उदाहरण बनी अफसाना बताती हैं कि मेरी कामयाबी में सबसे बड़ा हाथ पापा, चाचा और उनकी दादी का रहा है, जिन्होंने स्कूली शिक्षा के साथ-साथ हायर एजुकेशन के लिए भी साथ दिया। अब छोटी बहन आयशा भी थर्ड ग्रेड (द्वितीय लेवल) टीचर हो गई हैं।

सोच में अभी बदलाव की दरकार

Illiteracy in Mewat  से पार पाकर शिक्षा का उजियारा फैला रही अफसाना पॉजिटिव कनेक्ट से बातचीत में बताती हैं कि मुस्लिम समाज में भी बालिका शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है, लेकिन सोच में अभी बदलाव की दरकार है।

उनका मानना है कि मात्र पांचवीं, आठवीं तक पढ़ाने से कुछ नहीं होगा। बालिकाओं को बिना किसी डर के कॉलेज भेजकर उच्च शिक्षा दिलाना जरूरी है। इससे उनकी सोच बदलेगी और वे जीवन में कुछ अच्छा कर भी पाएंगी, तभी Illiteracy in Mewat का दाग धुल सकेगा।

यह सुनकर दिल को मिलता है सुकून

अफसाना कहती हैं, अब अनेक मुस्लिम बालिकाएं कॉलेज जा रही हैं और सरकारी नौकरी पाने की तैयारी कर रही हैं। यह सुनकर दिल को सुकून मिलता है। इससे उम्मीद बढ़ी है कि एक दिन Illiteracy in Mewat दूर होगी।

अफसाना के पिता सरफुद्दीन खान फौज में शौर्य चक्र विजेता रहे हैं और वहां से सेवानिवृत होकर फिलहाल एसबीआई बैंक में कार्यरत हैं। उनके पति जुबैर हनीफ बड़ौदा राजस्थान क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में मैनेजर हैं।

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जाहिरा बानो : जल संसाधन विभाग में जेईएन

अलवर के मालाखेड़ा ब्लॉक के गांव नांगल टोडियार निवासी जाहिरा बानो फिलहाल जैसलमेर में जल संसाधन विभाग में जेईएन है। Illiteracy in Mewat की जकडऩ से निकली जाहिरा पॉजिटिव कनेक्ट से बातचीत में बताती हैं कि गांव के सरकारी स्कूल से आठवीं तक की पढ़ाई की। पिता तैय्यब खान चाहते थे, बेटी इंजीनियर बने। मैंने वर्ष 2019 में सिविल में डिप्लोमा किया।

ताने सहे पर मुझे पढ़ाया

जाहिरा बताती हैं कि पहले ही प्रयास में जेईएन की नौकरी पाई। सफलता के पीछे मां-बाप का पूरा सपोर्ट रहा। Illiteracy in Mewat की रूढि़वादी सोच के कारण दुनिया के ताने भी सहे पर उन्होंने मुझे पढ़ाया और सर्दी के मौसम में सुबह 5 बजे बाइक से कोचिंग ले जाते थे। मैंने उर्दू भाषा भी पढ़ी और मां सरियम के साथ घर के काम में हाथ बंटाया। वे कहती हैं कि माता-पिता के अलावा प्रोफेसर रसीद का भी पूरा सहयोग रहा है।

समय से पहले निकाह पढ़ाई में बाधक

Illiteracy in Mewat मिटाने की प्रेरक बनी जाहिरा का मानना है कि पहले मुस्लिम समाज में बालिकाओं को कम पढ़ाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। वे मेहनत पर भरोसा जताते हुए कहती हैं कि मुस्लिम समाज में समय से पहले निकाह बेटी की पढ़ाई में बाधक बनती है। शादी में होने वाले लाखों के खर्च को फिजूलखर्ची बताते हुए जाहिरा इस राशि से बेटी की पढ़ाई पर खर्च करने की सलाह देती हैं।

Illiteracy in Mewat

बालिकाएं जाने लगी स्कूल

मालाखेड़ा ब्लॉक के ही गांव नांगल टोडियार की जमशीदा सार्वजनिक निर्माण विभाग राजगढ़ में जेईएन हैं। Illiteracy in Mewat मिटाने की एक और सितारा जमशीदा पॉजिटिव कनेक्ट को बताती हैं कि पिता अली हुसैन खान खेती करते हैं और प्राइवेट चिकित्सक भी हैं तो मां मामूरी बानो ग्रहणी है।

लगता है वह दिन दूर नहीं

पिता पढ़े-लिखे हैं। इस कारण उनके परिवार में पढ़ाई का माहौल है। वे बताती हैं कि पहले गांव में पढ़ाई का क्रेज कम ही था, लेकिन अब बालिका शिक्षा के प्रति जागरूक हो रही है। नतीजन, हर घर से बेटियां स्कूल जाने लगी हैं। इससे लगता है कि वह दिन दूर नहीं, जब Illiteracy in Mewat का दाग पूरी तरह धुल सकेगा।

बालिका शिक्षा में अवरोध
* दूरस्त गांवों में स्कूलों का अभाव।
* बालिकाओं को पढऩे के लिए गांव से बाहर नहीं भेजना।
* अशिक्षा के कारण अनहोनी का डर सताना।
* रुढि़वादी सोच व धर्म का हावी होना।
* आर्थिक संकट जैसी मजबूरियां।
* लिंग भेद के कारण बालिकाओं की अनदेखी।
Illiteracy in Mewat

बेटियां पढ़ेंगी तो आगे बढ़ेंगी

नवगठित डीग जिले में नगर ब्लॉक के गांव झीतरेडी के सरकारी स्कूल में प्रधानाध्यापक राजुद्दीन कुरैशी बताते हैं कि अलवर मेवात शिक्षा एवं विकास संस्थान अलवर जिले में बालिकाओं को पढ़ाने के प्रति लोगों को जागरूक करने का सतत प्रयास कर रही है। बालिका चाहे हिन्दु समाज की हो या फिर मुस्लिम समुदाय की।

पॉजिटिव कनेक्ट से चर्चा के दौरान उनका मानना है कि बेटियां पढ़ेंगी तभी तो आगे बढ़ेंगी। वे बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में स्थिति बदली भी है, लेकिन आज भी दकियानूसी सोच Illiteracy in Mewat के चलते हावी है। वे कहते हैं कि अलवर मेवात शिक्षा एवं विकास संस्थान (AMIED) को डीग जिले के मेवात में भी बालिका शिक्षा के लिए ऐसा अभियान चलाना चाहिए।

डीग के मेवात पर भी देंगे ध्यान

अलवर मेवात शिक्षा एवं विकास संस्थान के सदस्य सचिव नूर मोहम्मद बताते हैं कि संस्थान फिलहाल अलवर, खैरथल व करौली जिले में बालिका शिक्षा के लिए काम कर रहा है।

पॉजिटिव कनेक्ट से चर्चा में उन्होंने बताया कि डीग जिले का मेवात भी उनके ध्यान में है और संस्थान की मीटिंग में इस पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।

वे बताते हैं कि मुस्लिम बेटियां पढ़-लिखकर ना केवल आगे बढ़ रही हैं, बल्कि Illiteracy in Mewat का दाग मिटाने में बड़ी सहायक भी बन रही हैं।

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